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Sunday, October 21, 2018
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LITERATURE & POEMS

    Magahi poem देख निमन्त्रण कार्ड देह से, टपके लगे पसीना नेवता पुरते-पुरते हमरा, मोस्किल हो गेल जीना. मँहगाई के समय हको, तों जइहा बनके पकिया चुपके-चुपके देबे पड़तो, कम से कम सौ टकिया ओकरा से कम देला पर, झुकतो ईज्जत के झंडा बंद लिफाफा खुलते...
श्वेत हिरण सन सरपट दौड़ै-ए दिन दुर्निवार तैयो कुसुमक कली-कली करै-ए वनक श्रृंगार बहै पछवा आ कि पुरबा बेमाइ हमरे टहकत दरकत हमरे ठोर जेना पड़ल हो खेत बीच दरार साझी दलान बटल पड़ल पुरान आंगनमे नव देबाल नई बनत आब सांगह हमर घरक.... ई टूटल हथिसार सागर मोनमे आस्ते-आस्ते उतरै-ए डगमग करैत...

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