भिखारी ठाकुर की भोजपुरी रचना – शिव-विवाह

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shiv vivah-a poem by bhikari thakur

 

वार्तिका

द्वापर युग में श्री कृष्णचन्द्रजी के गोपाल गारी के किताब छप गइल बा।
कलियुग में भिखारी ठाकुर का शिकायत के किताब छप गइल बा॥

चारो युग में बहुत धम्मो अधर्म्मी नामी बलवान राजा गरीब साधु पंडित कवि गवैया रामलीला, राशलीला, नवटंकी यात्रा दल भाड़ के नकल भइल केदु मंडली को मालिक के चाहे एक्टर के शिकायत पुस्तक में सरिया के फरिया के नइखे छपाइल जइसन व्रती शिवाजी के श्री रामचन्द्रजी के श्री कृष्णचन्द्र जी वो भिखारी ठाकुर के गारी शिकायत फरिया केसरिया के सफाइ तरह पुस्तक में छपलबा, हमरा जाने में अइसन केहु के नइखे पुस्तक में छपाइल।

प्रसंग:

शिव-विवाह में शिव की बारात में द्वार-पूजा के पूर्व का दृश्य है, जब पार्वती के द्वार पर नगर के पुरवासी दूल्हे को देखने के लिए भारी संख्या में आ रहे हैं।

हरदम बोलऽ शिव, बम-बम बम-बम॥टेक॥
कर त्रिशुल बँसहा पर शंकर। डमरु बाजत बाटे, डम-डम डम-डम॥ हरदम…
मुख में पान न भांग चबावत। दसन बिराजत बा चम-चम चम-चम॥ हरदम…
पुरबासी निरखन बर लागे। नारी-पुरुष सब खम-खम खम-खम॥ हरदम…
नाई ‘भिखारी’ कहब कब तक ले। जब तक रही तन दम-दम दम-दम॥ हरदम…

प्रसंग:

शंकर की बारात द्वार-पूजा के लिए पार्वती के द्वार पर पहुँच चुकी है। सभी पुरवासी दुल्हे के अपारंपरिक रूप को देखकर डर कर अपने-अपने घर भाग रहे हैं।

(गउरा का पार्वती-योगी-कीर्त्तन)

हर-हर हर हर, हर-हर, हर-हर॥टेक॥
भोला बाबा के अमर कंठ में झलकत जहर पति पारबती कर। हर-हर हर-हर।
बाघ-छाल बैल पर बइठल, तेकरा ऊपर लटकल अजगर। हर-हर हर-हर।
ले योगीनी खप्पर हाड़ खात दर-दर, संग में भूत कर लसकर। हर-हर हर-हर।
‘भिखारी’ कहे सरासर लागल सभनी का डर, अब ना बसिहें नगर। हर-हर हर-हर।

वार्तिका:

बारात का भोजन करे का समय में बड़ा समझ कर के समधी के गारी गवाला, शिवजी का शादी में बड़ा समझ के ब्रह्मा-विष्णु के गारी गवाइल हा। अमिष गारि गारेउ, गरल, गरी कीन्ह करतार। प्रेम वैर के जानि युग, मानहिं बुधन गंवार॥

सतयुग शिव के सती के बिधि लिखलन संयोग।
कहत ‘भिखारी’ कलियुग के, करत शिकायत लोग॥
‘दास भिखारी’ कहत कछु, गणपति चरण भरोस।
पार्वती-महादेव का, शादी के गुण-दोष॥
त्रेतो-द्वापर युग में, राम-कृष्ण-बलधाम।
तेहिं के गारी होत बा, कहत ‘भिखारी’ तमाम॥
अब लउकत कलिकाल में, कहत ‘भिखारीदास’।
मोर शिकायत लिखत कवि, हमहूँ लिखत हूँ खास॥
दोनों सहायता जोरि कर, होई गइल भरपूर।
कहत ‘भिखारी’ प्रेम से, घर ह कुतुबपुर॥

प्रसंग:

शिव की बारात में विचित्र तरह के बारातियों का वर्णन किया गया है।

(लय कजली)

अइसन सोभेला सोहाग ससुररिया में॥टेक॥
सुनीला सतयुग के खबरिया, भोला बैल के सवरिया;
करिकर तइयरिया डगरिया में॥अइसन…॥
जेकर परत बा नजरिया, आदमी चाहे जानवरिया;
राहता छोड़ी के परात बा बधरिया में॥अइसन…॥
डमरू बाजत हाराहरिया आवत कौतुक देखनहरिया,
डर लागत बाटे दिन दुपहरिया में॥अइसन…॥
केहू के मुख सुअरिया, केहू सियारा के चेहरिया;
केहू कुत्ता खर अस रूप धरिया में।
सोचि के शुभ अवसरिया, सब चलल भारा-भरिया;
केहू चिन्हत नइखे केहू के गोहरिया में॥अइसन…॥
साथ योगी लसकरिया, पहुँचल पर्वत दरबरिया;
हलचल मचि गइल नेवतहरिया में॥अइसन…॥
भूत घेरले बा दुअरिया, देखि के सासु-सरहज-सरिया;
निन्दा करत बाड़ी रो-रो के अटरिया में॥अइसन…॥
अगुआ कइके ठगहरिया हँसउवलन एही घरिया;
उनका निमन नाहीं मिलल दुनियाँ भरिया में॥अइसन…॥
बर का कुरता ना चदरिया, करिया-करिया अजगरिया;
फुफकरिया छोड़त विष का लहरिया में॥अइसन…॥
शिव का लोटा नइखे थरिया, एको छप्पर पर ना नरिया;
साँप भरल बाटे सगरी गतरिया में॥अइसन…॥
हो के सब देवता से बरिया, लाखन सुनत बाड़न गरिया;
खइलन हुथका के मार कोहबरिया में॥अइसन…॥
होला शादी में खुशिहरिया, तेहि में के सामाचरिया;
जवन हो खेला उधरिया भितरिया में॥अइसन…॥
हउवन ब्रह्मा-विष्णु जरिया, तेकर भइल बा, उधरिया;
अगहरिया जानी कर जेवनरिया में॥अइसन…॥
‘भिखारी’ कहलन सारासरिया, घर ह कुतुपुर नगरिया;
बाटे गंगा-सरयुग का कगरिया में॥अइसन…।

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